ये पहली कथा है महाराज दशरथ की उनको दिया हुआ श्राप जो श्रवण के माता पिता ने दिया था उनके पुत्र के मरने के बाद.
महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे...
उन्होंने कई ऋषि-मुनि से हवन करवाए थे किन्तु उनको संतान नहीं हो रही थी। ..
पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से होंसला मिलता था जो कभी उन्हें
आशाहीन नहीं होने देता था...
मजे की बात ये कि इस होंसले की वजह किसी ऋषि-मुनि या देवता का वरदान नहीं किन्तु श्रवण के पिता के दवारा दिया गया श्राप था....
दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था
... (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)।
दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)
तो आप इस श्राप के माध्यम से समज सकते है की उनको आज नहीं तो कल पुत्र का सौभाग्य मिलेगा ही यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया....
ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई....
जैसा की आप जानते है की सुग्रिव का भाई बालि अत्यंत शक्तिशाली था. बालि की मायावी राक्षस से युद्ध की कथा तो अपने सुनी होगी। वह युद्ध कई माह तक चला किन्तु सुग्रिव को लगा उसके भाई की मृत्यु हो चुकी है. इस वजह से उसको किष्किन्धा का राजा बना दिया। किन्तु बालि जीवित लौट आया और वह सुग्रिव से बहुत नारज हुआ. सुग्रिव को अपमानित करके राज्य से निकाल दिया। सुग्रीव बालि के भय से अपने मंत्रियों के साथ ऋषयमुख पर्वत पर जाकर रहने लगा था क्योकि एक ऋषि के श्राप से बालि उस पर्वत पर नही आ सकता था. ये कथा आप सब जानते है.
बाली के इस भय की वजह से उन्होंने पूरी पृथ्वी छान मारी थी किन्तु उनको छुपने के लिए कोई जगह नहीं मिली इस वजह से सुग्रीव को सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....
प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...
सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे.... तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें क्या मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये.... ये सभ बाते उन्होंने अपने वानर सैनिक से कही। ये सब बाते श्रीराम भी सुन रहे थे.
उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?
तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... ''मैं जब बाली के भय से मारा-मारा फिर रहा यह से वह. तब मुझे पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....''
सोचिये अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो जाता...
इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-
"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें.... वही पुरुषार्थी है...."
ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है.......तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझो....
मतलब.....अगर आज मिले सुख से आप खुश हो...तो कभी अगर कोई दुख,विपदा,अड़चन आजाये.....तो घबराना नहीं.... क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो....



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